आए इस होली पर होलिका दहन करने के पीछे जुड़ी भक्त प्रह्लाद की कथा का विश्लेषण करते हैं
1.भक्त प्रहलाद द्वारा भगवान विष्णु को अपना इष्ट मानकर पूजा की जाती थी, जो उनके पिता हिरणाकश्यप को रास नहीं थी उनके मना करने पर भी जब प्रहलाद नहीं माने तो उन्हें अपने ही पुत्र की जान लेने में कोई संकोच नहीं हुआ। हिरणाकश्यप स्वयं ब्रम्हा जी का उपासक था। जिससे उनको कई वर्षो तक कड़ी साधना करना पर ब्रम्हा जी द्वारा दर्शन देने पर अमृत्रव का वरदान मांगा गया परन्तु ब्रम्हा जी स्वयं यह वरदान देने में असमर्थ थे अतः इसके पश्चात ब्रम्हा से इस तरह का वरदान मांगा गया कि ना दिन में मरू, ना रात में, ना अस्त्र से मरू, ना शस्त्र से, ना बाहर मरू ना अंदर, ना जल से मरू, ना अग्नि से अतः उसने अब स्वयं को भगवान मान लिया था।
परन्तु इस सृष्टि का नियम है कि जो आया है सो जाएगा लेकिन कोई अपनी सच्ची भक्ति से उस अमर लोक को भी प्राप्त कर सकता है जहां जाने के बाद हमारा जरा मरण समाप्त हो जाता है।
परमेश्वर कबीर साहेब जी भी कहते हैं
आया है सो जाएगा, राजा रंक फकीर।
एक सिंहासन चढ़ चले, एक बंधे जात जंजीर।।
2. इसके उपरांत हिरणाकश्यप द्वारा स्वयं को भगवान बताते हुए सम्पूर्ण नगर में अपनी पूजा आरंभ करवा दी परन्तु जब उसे पता चला कि उसका पुत्र प्रहलाद उसकी पूजा ना करके भगवान विष्णु को अपना आराध्य देव मानता है तो उसने क्रोधित होकर अपने ही पुत्र की जान लेनी चाही । इसके लिए कई तरीके अपनाएं गए परन्तु हर बार भक्त प्रहलाद की भक्ति की विजय रहीं।
परमेश्वर कबीर साहेब जी कहते है